निष्प्रभावी न्यायिक तंत्र बनाम नियोजित मुठभेड़ – किस्सा विकास दुबे का

कानपुर के बिकरु गांव के विकास दुबे ने छापा मारने आये आठ पुलिसकर्मियों की साथियों के साथ मिलकर हत्या कर दी। बाद में उज्जैन में पकड़े जाने के बाद उस अपराधी को पुलिस ने मुठभेड़ में मार डाला। उसका इंकाउंटर तो होना ही था, क्योंकि देश की लचर न्यायिक व्यवस्था के चलते उसको ह्ल्कीफुल्की सजा मिलती या न मिलती। किंतु मुठभेड़ का खेल मुझे एक्दम कृतिम-सा लगता है।

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कानपुर की दिल दहलाने वाली घटना

पिछले कुछ दिनों से विकास दुबे समाचार-माध्यमों (मीडिया) पर चर्चा का विषय रहा है। उसके बारे में पहले कभी मैंने नहीं सुना था। शायद कम ही लोग (कानपुर से बाहर) उसके बारे में सुनते रहे होंगे। मेरे ख्याल से उससे कहीं अधिक चर्चा में उत्तर प्रदेश के अन्य अपराधी-माफिया रहे हैं। उसका अनायास चर्चा में आना उस दिल दहलाने की घट्ना के बाद हुआ जब २-३ जुलाई की अर्धरात्रि में हुए पुलिस छापे (raid) में उसने अपने गुर्गों की फौज की मदद से ८ पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना में उसके मदद्गार खुद दो पुलिसकर्मी भी थे जिन्होंने छापे की गोपनीय जानकारी समय से पूर्व उस तक पहुंचाई। क्या विडंबना है कि पुलिस वालों को मरवाने में खुद अन्य पुलिसकर्मियों का हाथ था। घटना के बाद उसके कई साथी मारे गये और वह भागते-फिरते उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर तक दर्शनार्थ पहुंच…

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चीनी मोबाइल-ऐपों पर प्रतिबंध – गनीमत कि मेरे पास एक भी नहीं

हाल में सरकार ने ५९चीनी मोबाइल-ऐपों को देश में प्रतिबंधित कर दिया। मैंने पाया कि खुद मेरे फोन पर उनमें से एक भी नहीं। फिर क्यों ये इतने प्रचलित हैं भारतीयों के बीच? इस बारे में मेरी टिप्पणी।

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साम्यवादी (Communist) देश चीन के साथ हाल में पैदा हुई कड़ुवाहट और सीमा पर अतिक्रमण के साथ उसकी युद्ध के लिए गंभीर तैयारी को देखते हुए केन्द्र सरकार ने उस देश से आर्थिक संबंधों को यथासंभव सीमित करने का निर्णय लिया है। उस दिशा में चीनी कंपनियों की देश में आर्थिक क्रियाकलापों में भागीदारी घटाने का सिलसिला शुरु हो चुका है। उसी दिशा में एक कदम हें चीन में बने आधुनिक मोबाइल फोनों के “ऐपों” (अप्लिकेशन प्रोग्राम, application software) पर प्रतिबंध लगा दिया जाना। ऐसे ऐपों की कुल संख्या उनसठ (५९) है। यह सूची यहां प्रदर्शित है।

प्रतिबंधित चीनी मोबाइल ऐप (Apps)

जब यह समाचार मैंने पढ़ा तो स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा जगी कि देख लूं कि मेरे स्मार्टफोन में कौन-कौन से मौजूद हैं। संलग्न हैं ऐपों को प्रदर्शित करने वाले “स्क्रीन-शॉट” की तस्वीरः

मेरे सक्रिय मोबाइल ऐप

My MobileApps

गिनने पर मेरे स्मार्ट्फोन के ऐपों की संख्या ६२ निकली। और…

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पुनर्जन्म हिटलर का – चीन में पुरुषों के आनुवंशिक कूट-संकलन

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक निरंकुश शासक के तौर पर खुद को स्थापित कर लिया है। अब विश्वपर आधिपत्य जमाने के प्रयास में खत्रनाक तरीके अपना रहा है। चीन में पुरुषों के डीएनए नमूनों का आंकड़ा तैयार किया जा रहा है। नई तकनीकी के प्रयोग से वह असहमतों एवं विरोधियों को ठिकाने लगाने के प्रयास में है। उसके इरादे हिट्लर से भी खतरनाक हैं।

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शी जिनपिंग बनाम अडॉल्फ हिटलर

हिटलर कुख्यात शासक माना जाता है। शासकीय व्यवस्था में जहां कहीं ऐसा व्यक्ति दिखता है जो अपनी जिद में किसी भी हद तक जाने को तैयार हो, अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने की सोचता हो, उसे हिटलर की संज्ञा दे दी जाती है। हिटलर यहूदियों पर अत्याचार के लिए जाना जाता है; उन्हें गैस-चैंबर में ठूंसकर मारा गया यह इलजाम हिटलर पर लगाया जाता है। हिटलर दुनिया पर राज करना चाहता था और जर्मन “श्रेष्ठता” स्थापित करना चाहता था। लेकिन उसका अंत जर्मनी की बरबादी एवं विभाजन के साथ हुआ।

हिटलर की मृत्यु विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय १९४५ में हुई। तब से बहुत कुछ बदल चुका है। उस काल में डिजिटल तकनीकी जैसी कोई चीज नहीं थी। आज यह तकनीकी पर्याप्त विकसित है और राष्ट्रों की व्यवस्था काफी हद तक इसी तकनीकी पर निर्भर है। शांति स्थापित करना हो या युद्ध लड़ना हो निर्भरता…

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यथेयं पृथिवी मही … – अथर्ववेद में गर्ववती नारी के प्रति शुभेच्छा संदेश

प्राचीन वैदिक परंपरा में चार वेदों का उल्लेख हैः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। इनमें से प्रथम तीन को प्रमुख वेद माना जाता है। उनमें देवताओं की स्तुति के मंत्र एवं उनके गायन, यज्ञादि कर्मों के संपादन एवं आध्यात्मिक दर्शन से जुड़े मंत्रों का संकलन ही मुख्यतः देखने को मिलता है। इन वेदों की अपनी-अपनी उपशाखाएं भी हैं और उनसे संबंधित उपनिषद्, आरण्यक, ब्राह्मण नामक अन्य ग्रंथ भी वैदिक साहित्य में शामिल मिलते हैं। चतुर्थ वेद, अथर्ववेद, किंचित् भिन्न है और मानव जीवन से जुड़े व्यावहारिक ज्ञान ही इसकी प्रमुख सामग्री बताई जाती है।

अथर्ववेद में एक स्थल पर गर्भिणी नारी के प्रति आशीर्वचन या कर्तव्यबोध के मंत्र पढ़ने को मिलते हैं (अथर्ववेद काण्ड ६, सूक्त १८, मन्त्र १-४)। इन्हीं का उल्लेख यहां पर किया जा रहा है। इन मंत्रों में नारी को वृहद् विस्तार वाली पृथिवी (पृथ्वी) की उपमा दी गयी है जो विभिन्न स्थावर (गतिहीन)…

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“यदा यदा हि धर्मस्य …” – ब्लॉग-प्रविष्टियों पर आक्रोश-मिश्रित असहमति

“भगवान श्री कृष्ण के प्रति आपके विचार बहुत ही दुख दायक है |आप भगवान के उद्देश्यों को समझ नहीं पाये अतः आपके मन में शंकाएं हैं, आप हिंदू धर्म को भी नहीं समझ पाए सनातन धर्म को भी नहीं समझ पाए| आपके धर्म को अपने आचरण में ना ढालने के कारण ही धर्म की हानी हुई है | अतः आपसे निवेदन है की भगवान श्रीकृष्ण पर गलत टिप्पणी ना करें अगर विश्वास नहीं कर सकते तो दूसरों के विश्वास को कमजोर करने का प्रयास ना करें आप सनातन धर्म को मानने वाले हैं तो धर्म की रक्षा के लिए कृपया धर्म विरोधी बात ना करें | धन्यवाद |”  [Mon, 4 Nov, (2019) को प्राप्त ई-मेल का पाठ]

नौ वर्ष पूर्व २००९ में मैंने अपने ब्लॉग vichaarsankalan.wordpress.com पर दो लेख प्रस्तुत किए थे। प्रथम लेख (2010-07-26)  महाभारत में वर्णित भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा युद्ध के प्रति प्रेरित करने हेतु अर्जुन…

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चाणक्य नीति – राजकर्मचारी राजा से कैसा व्यवहार करे (भाग १)

अपने समय (लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व) के कुशल एवं अप्रतिम राजनीतिज्ञ चाणक्य के नाम से शायद ही कोई अपरिचित होगा। राजनीति के क्षेत्र में चाणक्य इतने चर्चित रहे हैं कि आधुनिक काल में राजनीतिक सूझबूझ में माहिर नेता को चाणक्य कहा जाता है। चाणक्य का असल नाम विष्णुशर्मा था, लेकिन चणक पुत्र होने के नाते उन्हें चाणक्य के नाम से ही जाना जाता है। कदाचित् अपने को चणक-पुत्र के तौर पर ही संबोधित किया जाना उन्हें पसंद रहा होगा। राजनीति के खेल में निपुण होने और वस्तुस्थिति के अनुकूल निर्णय लेने और आवश्यकतानुसार कुटिलता के प्रयोग के कारण उन्हें कौटिल्य़ भी कहा जाता है। (ध्यान रहे कि राजनीति में साम, दाम, दंड एवं भेद ये चारों तौर-तरीके अपनाए जाते हैं।)

     चाणक्य की एक रचना “कौटिलीय” या “कौटिल्य” अर्थशास्त्र है जिसमें शासकीय व्यवस्था के सभी पहलुओं की चर्चा की गई है। इस ग्रंथ में राजा के और उसके…

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गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस – क्या है अहिंसा?

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गांधी जयंती

आज गांधी जयंती है, दो अक्टूबर। गांधी-जन्म के १५० वर्ष पूरे हुए। मैं इस समय गेन्ज़विल (फ़्लोरिडा, अमेरिका) में हूं, कुछ हफ़्तों के प्रवास पर। भारत के राष्ट्रीय समय से यहां की घड़ी ९:३० घंटे विलंबित रहती हैं। यहां इस समय २ अक्टूबर का दिन है और तदनुसार अपने देश में रात्रि है।

जैसा कि परंपरा है गांधीजी के गुणगान करने और उनके विचारों की महत्ता का बखान करने का दिन रहता है यह। देश की खबरें जानने को इंटर्नेट के माध्यम से समाचार पत्रों पर नजर दौड़ाने पर मुझे गांधीजी के विचारों को प्रस्तुत करने, उन्हें प्रसारित करने वाली विज्ञप्तियां दिखती हैं। देश में राजनेताओं, सामाजिक संगठनों, एवं अन्य लोगों ने कैसे यह दिन गांधीजी को समर्पित किया होगा यह तो मुझे कल के समाचारपत्रों से ही पता चलेगा। हमें उनके सुझाए मार्ग पर चलना चाहिए आदि कहकर रस्मादयगी की परंपरा सदैव की भांति निभाई ही गई…

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“हृद्रोगं मम सूर्य नाशय” – ऋग्वेद में रोग-मुक्ति की प्रार्थना

वैदिक ग्रंथ ऋग्वेद में तमाम देवी-देवताओं की प्रार्थनाएं हैं जिनमें इन्द्र एवं अग्नि प्रमुख हैं। दरअसल वैदिक मान्यता के अनुसार प्रकृति के सभी घटकों, जैसे जल, अग्नि, वायु, वर्षा, आदि के पीछे कोई न कोई चेतन दैवी शक्ति सक्रिय रहती है। सूर्य भी उनमें से एक है जो स्थूल रूप से प्रकाशित होने वाला आकाशीय पिंड का स्वामी है। सूर्य को कभी-कभी सविता के तौर पर भी पूजा जाता है जिसका तात्पर्य है कि वह प्राणियों की उत्पत्ति और उनके जीवन का आधार है। उसी सूर्य से स्वास्थ्य की कामना के तीन मंत्र (ऋचाएं) ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में मुझे पढ़ने को मिले हैं, जिनका उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं। मेरी व्याख्या का आधार सायणाचार्य-कृत भाष्य (सायण-भाष्य) है जिसे मैंने अपने सीमित संस्कृत-ज्ञान के बल पर समझने का प्रयास किया है।

प्रार्थना का पहला मंत्र है –

उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवम्।

हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय ॥११॥

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वंदे मातरम् बोलना क्या देशप्रेम या राष्ट्रभक्ति का प्रमाण है? नहीं!

“वंदे मातरम्” बोलना देश्भक्ति का परिचायक नहीं है। इसे बुलवाना अपना वर्चस्व स्थापित करने से अधिक कुछ है।

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“वंदे मातरम्”

पिछले कुछ समय से कुछएक स्वघोषित राष्ट्रभक्त “वंदे मातरम्” बोलने-बुलवाने पर जोर दे रहे हैं। जो यह वचन (नारा) नहीं बोलता उसे राष्ट्रभक्ति-विहीन या उससे आगे देशद्रोही तक वे कहने से नहीं हिचकिचाते। इस श्रेणी के कुछ जन मारपीट पर भी उतर जाते हैं। कोई-कोई तो अति उत्साह में यहां तक कह बैठता है कि जो यह वचन नहीं बोलता उसे पाकिस्तान चला जाना चाहिए, गोया कि पाकिस्तान ऐसे लोगों के स्वागत के लिए बैठा हो। वे भूल जाते हैं कि कोई भी देश अपने नागरिक को अन्य देश को जबरन नहीं भेज सकता भले ही बड़े से बड़ा अपराध कर बैठा हो। और सजा भी दी जानी हो तो उसका निर्णय अदालत ही कर सकती है।

मुझे इस कथन या नारे से कोई शिकायत नहीं। किंतु कोई मुझसे कहे कि बोलो “वंदे मातरम्”  तो मैं कदाचित नहीं बोलूंगा। मेरा मानना है कि ऐसे शब्द समुचित अवसर पर…

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लोकसभा चुनाव 2019 – एक अनूठे ध्रुवीकरण की राजनीति

इस बार के चुनाव की खासियत यह है कि यह “मोदी हटाओ” व “मोदी दुबारा लाओ” के बीच है ठीक वैसे ही जैसे 1977 में इन्दिराजी “हटाओ” व “बचाओ” पर केंद्रित था।

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यों तो मैंने 1957 एवं 1962 के चुनाव देखे हैं (क्रमशः करीब 10 एवं 15 साल की उम्र में), लेकिन लोकतंत्र तथा चुनावों की समझ मैंने 1967 के चुनाव और उसके बाद ही अर्जित की। 1977 के चुनावों तक मैं शायद एक पंजीकृत मतदाता भी बन चुका था। उस समय के चुनावों की परिस्थिति एवं घटनाक्रम मुझे कुछ हद तक याद हैं। उस चुनाव से इस वर्ष के लोकसभा चुनाव की तुलना और संबंधित टिप्पणी मैं अपनी याददास्त पर निर्भर करते हुए कर रहा हूं। वैसे विस्तृत एवं ठीक-ठीक जानकारी अंतरजाल पर मिल ही जाएगी।

इस बार के लोकसभा चुनाव इस अर्थ में दिलचस्प हैं कि इसमें अपने किस्म के एक अनोखे ध्रुवीकरण की राजनीति देखने को मिल रही है। ध्रुवीकरण न जाति के आधार पर है और न ही धर्म अथवा क्ष्रेत्र के आधार पर। यह ध्रुवीकरण है प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध।

जब से क्ष्रेत्रीय दलों का आविर्भाव देश…

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